कभी ख़ुशी कि आशियाँ तो कभी घमों के अंधियारे है
ज़िन्दगी की धूप और छाँव को कहाँ कहाँ नहीं देखा मैंने
कभी फूलों के मुस्कान में, तो कभी नीले आसमान मे तैरते बादलों में
कभी सपनों के नय्या में, तो कबि यादों के शैय्या में
कभी किताबों के नशे में, तो कभी प्रकृति की मधुर संगीत में
कभी मेहनत के पसीने में, तो कभी आँखों के आँसुओं में
कभी दोस्तों के हँसी में, तो कभी बड़ों के आशीर्वाद में
ज़िन्दगी की रंगों में पता नहीं कब वक्त की गाडी निकलती गयी
वहाँ मैं ख़यालों में सपने बुनती रही, और यहाँ ज़िन्दगी की कारवां यूँही जुड़ता गया